पिहोवा 13 मार्च: जापान सोसायटी आफ रूरल डेवेलपमेंट इंजीनियरिंग के चेयरमैन नौकी हैयेशिडा ने कहा कि हरियाणा के फव्वारा सिंचाई प्रणाली से पानी की एक-एक बंूद का सदुयपयोग किया जा रहा है। इस प्रणाली का आने वाले समय में ओर अधिक उपयोग किया जाएगा, क्योंकि भूजल स्तर धीरे-धीरे नीचे जा रहा है। इसलिए पानी को बचाने के लिए फव्वारा सिंचाई प्रणाली को अपनाना होगा। इससे पानी की बचत होने के साथ-साथ किसानों की फसल भी अच्छी होगी।
चेयरमैन नौकी हैयेशिडा बुधवार को गांव गुमथला गढु में कर्ण सिंह च_ïा के फार्म पर बने फुव्वारों द्वारा काडा हरियाणा नहरी क्षेत्र विकास प्राधिकरण हरियाणा सूक्ष्म सिंचाई प्रोजेक्ट का अवलोकन करने के उपरांत बोल रहे थे। इससे पहले जापान सोसायटी आफ रूरल डेवेलपमेंट इंजीनियरिंग के चेयरमैन नौकी हैयेशिडा, तकनीकी चीफ यसुनोरी सैकी, निदेशक मितसौ इशीजिमा, सीनियर ज्वाईंट निदेशक वाटर रिसोर्सिस पुनित मितल, केन्द्रीय पानी संसाधन के निदेशक एसके शर्मा, चीफ इंजिनियर राकेश चौहान काडा विभाग, एससी एके रघुवंशी, एक्सिएन नीरज शर्मा ने हरियाणा सूक्ष्म सिंचाई प्रोजैक्ट का अवलोकन कर किसानों से सीधा संवाद भी किया।
तकनीकी चीफ यसुनोरी सैकी ने बताया कि पहली बार गांव गुमथला गढु में सूक्ष्म सिंचाई प्रोजैक्ट का अवलोकन करने के लिए पहुंचे है और इस प्रोजैक्ट को देखकर बहुत अच्छा लगा कि पानी को बचाने के लिए अच्छे प्रयास किए जा रहे है। इरिगेशन सिस्टम जलगाम महाराष्टï्र की कम्पनी से आए डा. एके भारद्वाज जैन ने बताया कि उनके प्रोजेक्ट 134 देशों में फसलों में सूक्ष्म सिंचाई पर काम करते हैं। उत्तरी प्रदेशों जैसे यूपी, हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड की मुख्य फसलें धान और गेहुं हैं। देश का कुल अन्न उत्पादन का 75 प्रतिशत इन प्रदेशों द्वारा उपजी फसलों से आता है। इन फसलों में पानी की अतिरिक्त मात्रा से सिंचाई की जाती है। फसलों में बूंद-बंूद सिंचाई ड्रिप द्वारा फसलों की जड़ों में दी जाती है। पौधे की आवश्यकता अनुसार इस विधि से पूरे खेत में पानी नहीं भरा जाता। अपितु सिंचाई को फसल की जड़ों के आस-पास ही दिया जाता है।
उन्होंने बताया कि इस विधि से पाईपों द्वारा एक छेद से एक घंटे में दो लीटर पानी निकलता है। हर पाईप में 40 सेंटीमीटर की दूरी पर एक छेद होता है। इस विधि द्वारा पानी के साथ-साथ फर्टीलाईजर भी दिया जाता है, जिससे फर्टीलाईजर का अच्छा उपयोग होता है। जो जड़ें आसानी से ग्रहन हर लेती हैं, जिससे पौधे की पैदावार अच्छी होती है एवं उपज में वृद्घि होती है। पानी की समुचित मात्रा में दिए जाने के कारण खेत में पानी नहीं भरता, जिसके कारण कीट रोग आदि का प्रकोप नहीं होता। उन्होंने बताया कि इस विधि में धान व गेंहु की फसल में ड्रिप द्वारा सिंचाई हेतु प्लास्टिक पाईप में दो-दो फुट की दूरी पर फसल के बीच बिछाई जाती है और इन पाईपों में लगे ड्रिपों से पानी रिस-रिस कर निकलता है। इस विधि की कुल लागत एक लाख रुपए प्रति एकड़ के करीब होती है।
उन्होंने बताया कि इस विधि के पाईपों की कम से कम आयु 10-12 साल होती है। इस प्रकार एक बार उपकरण लगाने से धान व गेहुं की लगभग 24 फसलें ली जा सकती हैं। सावधनी से बरतने पर इसकी आयु 15 से 20 वर्ष तक भी रहती है। तीन विधियों द्वारा खेती की सिंचाई की जा रही है। फुव्वारा विधि, ड्रिप विधि व किसानों की पारम्परिक विधि द्वारा खेती की जा रही है। टपका सिंचाई द्वारा 50 से 70 प्रतिशत तक पानी की बचत की जा सकती है। किसान कर्णजीत सिंह च_ïा ने बताया कि इस प्रोजेक्ट में 16 किसान भागीदार हैं। सबको अपने हिस्से का पानी बराबर मिल रहा है और सूक्ष्म सिंचाई पद्घति से खेती की जा रही है। इस पद्घति से पानी की 50 प्रतिशत बचत होती है। इस प्रणाली द्वारा जमीनी पानी की कमी को दूर करने में मदद मिलेगी। टपका सिंचाई और फुव्वारा सिंचाई में कम पानी से ज्यादा पैदावार ली जा सकती है। इस मौके पर चीफ इंजिनियर राकेश चौहान काडा विभाग, एससी एके रघुवंशी, एक्सिएन नीरज शर्मा, एसडीओ सुमित धीमान, नाथु राम कोर्डिनेटर, एसएन, हरपिंद्र सिंह किसान, महिंद्र सिंह, स्वर्ण सिंह, गुरविंद्र सिंह भट्टïी, हरप्रीत सिंह, जोगिंद्र सिंह, समनदीप सिंह, मलकीत सिंह, कुलवीर सिंह, दलीप सिंह, इंद्र सिंह, संदीप च_ïा, अमन भट्टïी आदि उपस्थित थे।
Post Now India Post Now India
