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इंसान व जल के बीच भावानात्मक व सांस्कृतिक रिश्तों को फिर से समझने की जरूरत: जैन

कुरुक्षेत्र, 9 अगस्त। दिल्ली के दीनदयाल रिसर्च इंस्ट्यिूट के जनरल सैके्रटरी अतुल जैन ने कहा है कि दुनिया में बढ़ते जल संकट को देखते हुए इंसान व पानी के बीच भावनात्मक व सांस्कृतिक रिश्तों को फिर से समझने की जरू रत है व इस बारे में लोगों को जागरूक करने की आवश्यकता है। पानी का संकट एक देश का नहीं बल्कि वैश्विक संकट है। इस दिशा में ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में गंभीर परिणाम हो सकते हैं। व्यक्तिगत स्तर पर हर व्यक्ति नाना जी देशमुख जैसे महापुरूषों के जीवन दर्शन को आधार बनाकर पानी का संरक्षण कर सकते हैं।

वे शुक्रवार को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में छात्र कल्याण अधिष्ठाता की ओर से आयोजित रिवाईविंग इमोशनल एंड कल्चरल बोंडिंग बिटवीन मैन एंड वाटर विषय पर आयोजित कैम्पस लैक्चर सीरीज में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे।

उन्होंने कहा कि पानी भारतीय परिवारों की जीवन संस्कृति का अभिन्न अंग था लेकिन जैसे ही यह उत्पाद बना वैसे ही समस्याएं भी बढ़ गई। उन्होंने कहा कि यूनाईटेड नेशन ने समग्र विकास की जिन 17 लक्ष्यों को निर्धारित किया है। उन्हें नाना जी देशमुख के जीवन दर्शन से लिया गया है जिन्हें भारत सरकार की ओर से गुरूवार को भारत रत्न से मरणोपरांत सम्मानित किया गया है। डॉ. अतुल जैन ने पानी के साथ इंसान के पवित्र रिश्ते के बारे में जागरूकता पैदा करने की बात कही। उन्होंने रोहिणी नक्षत्र अमावस्या के बारे में कई उपाख्यानों और पारंपरिक वैज्ञानिक ज्ञान को बताया। उन्होंने बताया कि पूरे देश में जल निकायों को साफ किया गया था और इसके साथ कई लोक कथाएं जुड़ी हुई हैं।

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. कैलाश चन्द्र शर्मा ने कहा है हमें अपनी जड़ो की ओर लौटने की जरूरत है। खेती के पारम्परिक तरीकों को छोडक़र वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना होगा। हमें ऐसे उत्पादों का निर्माण करें व ऐसे उत्पाद ही तैयार करें जिसमें पानी की खपत कम हो। प्राकृतिक जल संसाधनों का संरक्षण करें तभी हम जल संकट की समस्याओं से बाहर निकल सकते हैं। जल शक्ति पंच भूतों में से एक शक्ति है। इसको पहचानकर बचाना आवश्यक है। संरक्षण का यह कार्य सिर्फ सरकारों से संभव नहीं है। इसके लिए आम आदमी को आगे आने की जरूरत है।

कुलपति ने कहा कि 1975 में आपातकाल के दौरान, तत्कालीन सरकार के खिलाफ नानाजी देशमुख के नेतृत्व में पूरे अभियान की शुरुआत की गई थी, जिसे बाद में मंत्री परिषद की पेशकश के रूप में चित्रकूट में एक जड़ स्तरीय संस्थान स्थापित करने के लिए कहा गया था। कुलपति ने कहा कि मनुष्य प्रकृति की महत्वपूर्ण रचना है लेकिन उसे अन्य जीवित प्राणियों के साथ संबंध में रहना होगा और प्रकृति का सम्मान करना होगा।

उन्होंने छात्रों को भौतिकवादी दृष्टिकोण से दूर करने, सामाजिक लाभ के लिए एक कैरियर विकसित करने और अपनी जड़ों की ओर लौटने का नारा दिया। उन्होंने बताया कि पानी केवल मनुष्यों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, यह ब्रह्मांड को समग्र रूप से बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
मध्य प्रदेश की पूर्व शिक्षा और महिला और बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनीस, ने लालच और ज़रूरत के बारे में गांधीजी द्वारा दिए गए ज्ञान के साथ-साथ पांच तत्वों के साथ मनुष्य के संबंध के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि पानी जहां भी गिरे उसे संचित करें। सरकार नदी तक सीमित रहती है क्योंकि सरकार के साथ लोग भी इस दिशा में काम करें। उन्होंने कहा कि गंगा में पानी तो बहुत है, पर सारा पानी तुम्हारे लिए नहीं। भरे बिना तो सब स्रोत खाली हो जाएंगे। दैनिक जीवन में जल बचाओ। पर्यावरण से प्यार कम हो रहा है। पुरातन रीति रिवाज में जल संरक्षण को दैैनिक जीवन का हिस्सा बनाया गया है। हमें इस ओर लौटने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण से ही हम आने वाली पीढिय़ों की जरूरतों को पूरा कर सकेंगे।

डॉ. मीना जांगिड़, दीन दयाल अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली की अनुसंधान अध्येता ने गांवों में पारंपरिक लोगों से जुडऩे के महत्व के बारे में बात की और राजस्थान के लोगों द्वारा दर्ज किए गए बादलों के पारंपरिक व्यवहार के बारे में बहुत जानकारीपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने 74 प्रकार के बादलों और संबंधित प्रकार की बारिश के बारे में बताया।

श्रद्धा मराठे ने पारंपरिक परंपराओं और भारतीय परंपरा में जल संरक्षण की पवित्रता के बारे में बात की। छात्र कल्याण अधिष्ठाता प्रो. पवन शर्मा ने अतिथियों का स्वागत और परिचय कराया।

इस मौके पर कुलसचिव डॉ. नीता खन्ना, डीन अकादमिक मामले, प्रो. मंजुला चौधरी, विभिन्न विज्ञान विभागों के चेयरपर्सन, निदेशक सहित भूविज्ञान, भूभौतिकी, भूगोल और पर्यावरण विज्ञान विभागों के छात्र मौजूद रहे।

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