रियाणा कला परिषद् मल्टी आर्ट कल्चरल सेंटर व उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज के संयुक्त तत्वावधान में चल रहे तीन दिवसीय सांग उत्सव का भव्य समापन किया गया। उत्सव के समापन अवसर पर जिला शिक्षा अधिकारी अरुण आश्री बतौर मुख्यअतिथि पहुंचे। वहंी विशिष्ट अतिथि के रुप में प्राध्यापक बलवान सिंह ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। कार्यक्रम से पूर्व दीप प्रज्जवलित कर अतिथियों ने सांग का शुभारम्भ किया। मंच का संचालन विकास शर्मा द्वारा किया गया। मैक के क्षेत्रीय निदेशक नागेंद्र शर्मा ने अतिथियों का स्वागत किया तथा सभी को सम्बोंधित करते हुए कहा कि उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के सहयोग से आयोजित सांग उत्सव में कुरुक्षेत्र के अतिरिक्त करनाल, कैथल, अम्बाला तथा पानीपत आदि जिलों से भी सांगप्रेमी पहुंचे हैं, इससे सिद्ध होता है कि मल्टी आर्ट कल्चरल सेंटर अपने उद्देश्य में सफल हो रहा है। उन्होंने एनसीजेडसीसी के निदेशक इंद्रजीत सिंह ग्रोवर का भी धन्यवाद किया, जिनके कारण मैक में तीन दिवसीय सांग उत्सव का सफल आयोजन हो पाया। गौरतलब है कि 19 अगस्त से प्रारम्भ हुए उत्सव में पहले दिन रोहतक के प्रदीप राय ने हीरामल जमाल प्रस्तुत किया वहीं दूसरे दिन करनाल के विष्णु सांगी द्वारा सांग वीर विक्रमाजीत दिखाया गया। उत्सव के समापन पर आयोजित सांग सेठ ताराचंद में कैथल के देवबन निवासी गोविंद शर्मा व बलबीर शर्मा ने सांग की महता का भी बखान किया। किस्सा सुनाते हुए बताया कि दिल्ली में सेठ ताराचंद रहते हैं जिनके घर चंद्रगुप्त जन्म लेता है। सेठ ताराचंद एक साधु के कहने पर चंद्रगुप्त को मनसामल नामक सेठ के घर गिरवी रख देता है। मनसामल के दो पुत्र तथा दो पुत्रवधुएं चंद्रगुप्त से स्नेह करने लगती हैं। धीरे धीरे चंद्रगुप्त युवा हो जाता है। और मनसामल अपने अन्य पुत्रों की अपेक्षा चंद्रगुप्त से ज्यादा प्रेम करता है तो मनसामल के पुत्र चंद्रगुप्त से घृणा करना शुरु कर देते हैं। उधर पुत्र को गिरवी रखने के बाद ताराचंद दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाता है। लकड़ी काटकर ताराचंद अपनी गुजर बसर करता है। जिसके बाद एक दिन ताराचंद घूमते हुए एक शहर में पहुंचता है जहां उसे एक साधु बाबा मिलते हैं। साधु बाबा ताराचंद को कहते हैं कि जब तक चंद्रगुप्त वापिस नहंी आएगा, तुम्हारी यातनाएं ऐसे ही रहेंगी। ताराचंद बाबा की बात सुनकर चंद्रगुप्त को ढूंढने निकल पड़ता है। बारह साल बाद चंद्रगुप्त मिलता है तो ताराचंद अपने पुत्र को लेकर बाबा के पास पहुंचता है। जहां ताराचंद को पता चलता है कि बाबा के भेष में स्वयं उनकी धर्मपत्नी धर्मांगी है। जिसने पुत्र वियोग के कारण बाबा का भेष बनाया था ताकि अपने पति को ज्ञान दे सके। इस प्रकार ताराचंद को अपनी पत्नी और पुत्र मिल जाते हैं। सांग के माध्यम से नारी के पुत्रमोह को दिखाने का प्रयास किया गया। सांग मंचन के दौरान कलाकारों ने जहां रागनीयों के माध्यम से सभी का मनोरंजन किया वहीं सांग की पटकथा ने भी दर्शकों को लुभाने में पूर्ण सहयोग दिया। अंत में मुख्यअतिथि महोद्य को सम्मानित किया गया। वहीं उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र की ओर से कार्यक्रम समन्वयक अजय गुप्ता ने सभी कलाकारों को स्मृति चिन्ह भेंट किए। इस मौके पर दूरदराज से सांग प्रेमी उपस्थित रहे।
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