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स्त्री के आधे-अधूरेपन की त्रासदी को दिखा गया नाटक हयवदन

नारी के अधूरेपन की त्रासदी और स्त्री पुरुष के उलझावपूर्ण संबंधों की अबूझ पहेली को दिखानेवाले नाटक तो समकालीन भारतीय रंग परिदृश्य में और भी हैं, लेकिन जहाँ तक सम्पूर्णता की अंतहीन तलाश तथा बुद्धि, मन, आत्मा और देह के संघर्ष के परिणाम का प्रश्न है तो गिरीश कारनाड का हयवदन कई दृष्टियों से निश्चय ही एक अनूठा नाट्य प्रयोग है। ये कहना था वरिष्ठ साहित्यकार व कवि दिनेश दधिचि का। वे राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के सभागार में आयोजित नाटक हयवदन के दौरान दर्शकों को सम्बोंधित कर रहे थे। रंगआधार संस्था, जींद के द्वारा प्रस्तुत नाटक का निर्देशन रंगकर्मी अमर कुनाल द्वारा किया गया। मंच का संचालन संस्था के सांस्कृतिक प्रभारी विकास शर्मा द्वारा किया गया। इस मौके पर खण्ड शिक्षा अधिकारी विनोद कौशिक बतौर मुख्यअतिथि उपस्थित रहे। द्वंद्वपूर्ण आधुनिक कहानी पर आधारित नाटक में देवदत्त, पद्मिनी और कपिल के त्रिकोणिय प्रेम को दिखाया गया। मुखौटे, गुड्डे गुड़ियों और गीत संगीत के माध्यम से एक लचीले रंग शिल्प में प्रस्तुत नाटक आरम्भ से अंत तक लोगों के दिलों में अपनी छाप छोड़ रहा था। दो दो पुरुषों के होते हुए भी अतृप्त एवं अधूरी और सुहागिन होकर भी अभागिन रह जाने वाली पद्मिनी इस नाट्य कथा में केंद्र बिंदु रही। जिससे विलक्षण प्रसंग, रोचक चरित्र, जटिल संबंध तथा रोमांचक नाट्य मोड़ों के साथ नाटक की कहानी आगे बढ़ती गई। कपिल देवदत्त का विवाह प्रस्ताव पद्मिनी के घर लेकर जाता है। जहां पद्मिनी को देख कपिल उस पर आसक्त हो जाता है। किंतु देवदत्त के साथ अपनी मित्रता की मर्यादा उसे रोक देती है और वह उन दोनों का विवाह करवा देता है। किंतु पद्मिनी सुडौल शरीर वाले कपिल की ओर आसक्ति रखने लगती है, जिससे देवदत्त परेशान हो जाता है। एक दिन काली मंदिर में जाकर देवदत्त अपनी गर्दन काट लेता है। जब कपिल उसे ढूंढते हुए वहां पहुंचता है तो मित्र वियोग में वह भी स्वयं की गर्दन काट लेता है। बाद में पद्मिनी आती है और दोनों के सिर कटे देख मां काली का आह्वान करती है। मां काली प्रकट होती है और दोनों के शीश जोड़ने को कहती है। पद्मिनी कपिल के शरीर पर आसक्त देवदत्त का सिर कपिल के शरीर पर और कपिल का सिर देवदत्त के शरीर पर जोड़ देती है। पद्मिनी को सुंदर चेहरा और सुडौल शरीर दोनों एक ही व्यक्ति में मिल जाते हैं। धीरे धीरे कहानी आगे बढ़ती है तो देवदत्त ब्राह्मण होने के कारण पूजा पाठ में ही लगा रहता है, जिससे उसका शरीर धीरे धीरे कमजोर होना शुरु हो जाता है। उधर कपिल मेहनत करके देवदत्त के शरीर को भी सुडौल बना लेता है। इस प्रकार पद्मिनी की एक ही पुरुष में सुंदरता और सुडौल तन पाने की चाह समाप्त हो जाती है। नाटक इतना रोचक था कि गर्मी होने के बावजूद भी दर्शक नाटक के अंत तक सभागार में ही बैठे रहे। नाटक का संगीत, नाट्य तकनीक कलाकारों के अभिनय में निखार लाने में सहायक थी। नाटक के अंत में मुख्यअतिथि विनोद ने सभी को सम्बोंधित करते हुए कहा कि विभिन्न रचनाकारों की रचनाओं के अपने अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत करना वास्तव में सराहनीय है। एक कलाकार पूरी मेहनत के बाद जब मंच पर उतरता है तो उसकी लगन और परिश्रम प्रस्तुति में साफ नजर आता है। नाटक में देवदत्त की भूमिका राजीव ने निभाई, पद्मिनी पारुल कौशिक, कपिल हिम्मत आर्य, गुड़िया शिवकुमार किरमिच व निखिल पारचा बने। सहयोगी निकिता शर्मा, कुलदीप शर्मा, चंचल शर्मा, संदेश खन्ना, समीर मैहरा व विशाल विशु रहे। संगीत अमर कुनाल का रहा, प्रकाश व्यवस्था गौरव दीपक जांगड़ा ने सम्भाली तथा रुप सज्जा विकास शर्मा ने की। अंत में नाटक निर्देशक अमर कुनाल ने सभी का धन्यवाद किया।

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