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मंजी साहब गुरूद्वारा श्रद्धालुओं के लिए है श्रद्धा, विश्वास व आस्था का केन्द्र, पहली पातशाही जगत गुरू श्री गुरू नानक देव जी ने यहां जगाई थी भक्तों की आस्था

करनाल 21 जुलाई: करनाल का ऐतिहासिक मंजी साहिब गुरूद्वारा लोगों की प्रखाड आस्था का केन्द्र है। माना जाता है कि वर्ष 1515 में पहली पातशाही जगत गुरू श्री गुरूनानक देव जी महाराज कुरूक्षेत्र सूर्य ग्रहण मेले से चलकर उदासी नामक अपनी पहली धार्मिक यात्रा पर आऐ थे। यह गुरूद्वारा अब करनाल शहर के सर्राफा बाजार में स्थित है। मंजी साहब गुरूद्वारा श्रद्धालुओं की श्रद्धा, विश्वास व आस्था का केन्द्र है। उस समय इस स्थान को ठठेरा मोहल्ला के नाम से जाना जाता था। गुरू नानक देव जी ने यहां के एक बगीचे में एक टीले पर बैठकर भक्तों की एक बड़ी भीड़ के साथ शब्द और भजन गाए और जिसके कारण लोगों में उनके प्रति आस्था बढ़ती गई। बताया जाता है कि उस समय शाह अबू अली शाह कलंदर का काफी दबदबा था और लोग उस समय उनके नाम का खौफ भी मानते थे। उस समय कोई अन्य लोग घोड़े की सवारी नहीं कर सकता था और ना ही उनके सामने मंजी(चारपाई) पर बैठ सकता था। उन्होंने अपनी रिद्धि-सिद्धि से जनता को अपने वश में कर रखा था। ऐसे समय में गुरू नानक देव जी ने लोगों को सही मार्ग दिखाने के लिए वहां रखी मंजी पर अपना आसन लगाया और बैठ गए। ऐसी स्थिति में गुरू नानक देव जी के साथ बढती हुई लोगों की भीड़ को देखकर इसकी जानकारी जब कलंदर साहब को मिली तो उन्हें जलन महसूस हुई। कलंदर साहब अपनी रिद्धि-सिद्धि से गुरू नानक देव जी को प्रभावित करना चाहते थे, इसके लिए उन्होंने दीवार को उखाडक़र उसे अपना वाहन बनाया और उस पर बैठकर चल दिये, जैसे ही वह ठठेरा मोहल्ला के नजदीक जो कि वर्तमान में पुरानी सब्जी मंडी का क्षेत्र है और कलंदर साहब की मजार है, गुरू नानक देव जी के पास पहुंचे तो बताया जाता है कि दीवार वहीं पर रूक गई। कलंदर साहब को एहसास हुआ कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि कोई पहुंचा हुआ संत है। ऐसे संत को हराना नामुमकिन है। कलंदर साहब दीवार से उतर गए और गुरू के पास चले गए। गुरू जी ने उन्हें सलाह दी कि वे अपनी दैवीय शक्तियों का इस्तेमाल इन बेकार के दिखावे में ना करें बल्कि उनसे लोगों का भला करें। गुरू नानक देव जी की वाणी से कलंदर साहब प्रभावित हुए और गुरू नानक देव जी की प्रखाड़ आस्था से श्रद्धालुओं ने उनकी मंजी के स्थान को आज पवित्र मंजी साहब गुरूद्वारा नाम दिया, यह गुरूद्वारा भक्तों की आस्था का केन्द्र है। माना जाता है कि सिखों के छठे गुरू गुरू हरिकिशन साहिब जी भी 1663 में दिल्ली की यात्रा के दौरान इस स्थान पर आए थे।

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