समाज के लोग सदैव औरत और मर्द के रिश्ते पर कहीं न कहीं संदेह जरुर रखते हैं। कोई भी औरत मर्द के रिश्ते को गहराई से समझने की कोशिश नहीं करता। बिना कुछ जाने समाज में लोग औरत को ही गलत ठहराना शुरु कर देते हैं, लेकिन वास्तविकता को जानने का प्रयास कोई भी नहीं करना चाहता। ऐसा ही कुछ देखने को मिला मैक की साप्ताहिक संध्या में। मौका था कंबाईन थियेटर ग्रुप, चण्डीगढ़ के कलाकारों द्वारा अभिनीत नाटक आरक्तक्षण का। नाटक का लेखन महेश एलंकुचवार का रहा तथा निर्देशन मनीष डोगरा ने किया। इस अवसर पर कुरुक्षेत्र विकास बोर्ड के मानद सचिव मदन मोहन छाबड़ा बतौर मुख्यअतिथि उपस्थित रहे। वहीं कार्यक्रम की अध्यक्षता हरियाणा कला परिषद के पूर्व उपाध्यक्ष सुदेश शर्मा ने की। विशिष्ट अतिथि के रुप में डा. कृष्ण कुमार तथा अजमेर सिंह उपस्थित रहे। कार्यक्रम से पूर्व मैक के क्षेत्रीय निदेशक नागेंद्र शर्मा ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि मैक द्वारा आयोजित होने वाले कार्यक्रम दर्शकों के मनोरंजन के साथ साथ एक सीख देने के लिए आयोजित किए जाते हैं। प्रत्येक कार्यक्रम का उद्देश्य प्रदेश की कला को विस्तार देना है। मंच का संचालन विकास शर्मा द्वारा किया गया। नाटक आरक्तक्षण मराठी परिवेश पर आधारित था। जिसमें एक दम्पति अपनी बेटी के साथ रहते हैं। बाबू नौकरी करते हैं और पद्मा घर सम्भालती है। 16 साल की बेटी लाली स्कूल जाती है। पद्मा का बेटा शशी फौज में होने के कारण शहीद हो जाता है। जिसके कारण पद्मा अक्सर परेशान रहने लग जाती है। पद्मा के घर एक 16 साल का लड़का राजू पेंइग गेस्ट के रुप में रहता है। लेकिन पद्मा न तो उससे किराया लेती और न ही उसे कभी घर छोड़कर जाने देती। अपनी मां को पराए लड़के राजू के साथ इतना घुला-मिला देख लाली मां से नफरत करने लग जाती है। लाली और बाबू की बेरुखी के कारण पद्मा राजू के साथ ही अधिक समय बिताती। इतना ही नहीं कपड़े तक राजू की पसंद से पहनती। एक दिन पद्मा के सिर दर्द होने के कारण राजू पद्मा का सिर दबाना शुरु कर देता है, जिसे लाली देख लेती है। मां के कमरे में दोनों को देख लाली राजू को खूब भला बुरा कहती है। राजू घर छोड़कर जाने की बात करता है तो लाली उसे जाने भी नहीं देती। दोनों के बीच चल रही बहस के बाद पता चलता है कि दोनों एक दूसरे को प्यार करते हैं। उधर पद्मा बाबू को उसका अकेलापन दूर करने के लिए कहती है तो बाबू उस पर आगबबूला हो जाता है और घर में जवान बेटी का हवाला देता है। लाली चोरी से मां के बक्से में साड़ियों के बीच रखे कुछ खत पढ़ लेती है, और उन खत में लिखी प्रेम भरी बातें बाबू जी को बता देती है। बाबू जी गुस्से पर काबू नहीं रख पाते और लाली पर हाथ उठा देते हैं। पद्मा बाबू को बताती है कि ये प्रेम पत्र न तो किसी ने पद्मा को लिखे हैं और न ही पद्मा ने किसी के लिए। अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए अक्सर ये खत लिखकर बक्से में रख देती थी। घर में राजू के आने से उसमें शशी को देखती थी। राजू ने पद्मा के दिल में मरे हुए बेटे को जिंदा किया है। इस तरह पद्मा अपनी बेगुनाही साबित करती है तो बाबू को खुद पर पछतावा होता है और वह पद्मा को गले लगा लेता है। बेहतरीन सेट, वेशभूषा, संवाद आदि के कारण कलाकारेां के नाटक के साथ पूरा न्याय किया। नाटक में बाबू की भूमिका सुग्रीव मैहरा ने निभाई, पद्मा की भूमिका में शायना जग्गा, लाली की भूमिका महक मनू माल्यान व राजू की भूमिका साहिल खान ने निभाई। नाटक में रुपसज्जा व सहनिर्देशन विकास शर्मा का रहा। वस्त्रसज्जा रुबी सैनी, संयोजक चंचल शर्मा तथा सहायक के रुप में कुलदीप शर्मा व आकाशदीप रहे। नाटक के अंत में मुख्यअतिथ मदन मोहन छाबड़ा ने सभी कलाकारों की सराहना करते हुए कहा कि समाज के विभिन्न मुद्दों को जीवंत करते हुए दर्शकों को दिखाने के लिए कलाकार बधाई के पात्र हैं। कम समयावधि में एक पूरी कहानी को दर्शाना वास्तव में सराहनीय है। वहीं सुदेश शर्मा ने भी तकनीकी बातों को बताते हुए नाटक की प्रशंसा की। नागेंद्र शर्मा ने सभी अतिथियों को पौधा भेंटकर आभार व्यक्त किया। इस मौके पर चण्डीगढ़, करनाल, अम्बाला आदि से भी दर्शक उपस्थित रहे।
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