भाई.भतीजावाद जैसी नीति अपनाकर कोई भी लम्बे समय तक अपने पांव नहीं जमा सकता। व्यवस्था में भ्रष्टाचार के जरिये पांव जमाने वाले लोग जब फंसते हैं तो कोई भी उनका सहारा नहीं बनता। ऐसा ही कुछ कुरुक्षेत्र के कलाकारों ने रंग उत्सव में नाटक सैंया भए कोतवाल का मंचन कर दिखाया। मौका था न्यू उत्थान थियेटर ग्रुप द्वारा आयोजित रंग उत्सव के पहले दिन का, जिसमें मैक की ओर से संजय भसीन के निर्देशन में कलाकारों ने वसंत सबनीस के लिखे नाटक सैंया भए कोतवाल का मंचन किया। उत्तर क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र पटियाला तथा मल्टी आर्ट कल्चरल सेंटर के संयुक्त सहयोग से आयोजित इस उत्सव के उद्घाटन अवसर पर विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के निदेशक डा. रामेंद्र सिंह बतौर मुख्यअतिथि उपस्थित रहे। वहीं विशिष्ट अतिथि के रुप में जिला शिक्षा अधिकारी अरुण आश्री, विनोद कौशिक तथा राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय की प्राचार्या संतोष शर्मा उपस्थित रहे। मंच का संचालन डा. मोहित गुप्ता द्वारा किया। उत्सव के उद्घाटन अवसर पर कार्यक्रम का शुभारम्भ अतिथियों द्वारा दीप प्रज्जवलित कर तथा शहीदों को नमन करके किया गया। वहीं न्यू उत्थान थियेटर ग्रुप के सदस्य नरेश सागवाल तथा विकास शर्मा ने पुष्प गुच्छ देकर अतिथियों का स्वागत किया। राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में चल रहे तीन दिवसीय रंग उत्सव में नाटक से पूर्व टेलंट हंट कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसमें सिद्धार्थ, हिमांश भारद्वाज तथा पियुष ने अपनी गायकी से समां बांधा। वहीं नाटक में भ्रष्टाचार की पोल खोलते हुए दिखाया कि काबिल लोंगो की बजाय सत्ता में भ्रष्ट लोग जो अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। तमाशा शैली में मंचित नाटक में सूर्यपुर नगर की कहानी को दिखाया गया। मूर्ख राजा रणधीरा के कोतवाल के मरने के बाद सभी को नए कोतवाल की चिंता लग जाती है। जिसका फायदा प्रधान उठाता है और अपने बेवकूफ साले को कोतवाल बना देता है। राज्य का हवलदार और सिपाही नए कोतवाल को देखकर खुश नहीं होते और उसे फंसाने की तरकीब सोचने लगते हैं। कोतवाल से बात करने पर हवलदार को पता चलता है कि उसे गाना सुनने का शौंक है। ऐसे में हवलदार अपनी प्रेमिका मैनावती के साथ मिलकर कोतवाल को फसाने की चाल चलता है और कोतवाल के आगे मैनावती के प्यार का झांसा डाल देता है। मैनावती कोतवाल से शादी करने की शर्त पर राजा का छपरी पलंग मांग लेती है। कोतवाल हवलदार और सिपाही से छपरी पलंग मंगवा लेता है। वहीं हवलदार राजा को भी इस चोरी की खबर दे देता है। छपरी पलंग आने के बाद कोतवाल जब मैनावती से शादी करने पहुंचता है तो राजा ब्राहम्ण का वेश धारण कर शादी करवाने पहुंच जाता हैं। लेकिन बाद में नाटक से जब पर्दा उठता है तो पता चलता है कि दुल्हन मैनावती नहीं बल्कि मैनावती का शागिर्द सख्या है। अंत में राजा हवलदार से खुश होकर उसे कोतवाल बना देता है। नाटक में कलाकारों का अभिनय, संगीत, वेशभूषा तथा संवाद सभी को रोमांचित करने में अपनी अहम भूमिका निभा रहे थे। नाटक के दौरान हास्य के पलों का लोगों ने खूब आनंद लिया। नाटक में कोतवाल की भूमिका में रंगकर्मी शिव कुमार किरमच ने अपनी कलाकारी से सभी को लोटपोट कर दिया। वहीं हवलदार की भूमिका में साजन कालडा, सिपाही गौरव दीपक जांगड़ा, मैनावती की भूमिका में पारुल कौशिक ने अपने अभिनय की अनूठी छाप छोड़ी। राजा की भूमिका में नितिन गुप्ता, प्रधान की भूमिका में चंचल शर्मा, सख्या राजीव कुमार ने अपनी हिस्सेदारी दी। नाटक में संगीत संचालन शुभम कल्याण का रहा। राजवीर राजू ने रिदम, विकास शर्मा, सिद्धार्थ सिद्धू, निकिता शर्मा, अनूप तथा आकाश ने गायन में संगत दी। प्रकाश व्यवस्था रजनीश भनौट ने सम्भाली। नाटक के अंत में मुख्यअतिथि ने सभी कलाकारों को स्मृति चिन्ह भेंट किए। वहीं न्यू उत्थान थियेटर ग्रुप के नवनिर्वाचित अध्यक्ष नीरज सेठी, नरेश सागवाल, कमल कौशिक तथा धर्मपाल गुगलानी व अनु माल्यान ने सभी अतिथियों को शाल व स्मृति चिन्ह भेंट किए।
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