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अंधा युग के मंचन से हुआ नाट्य उत्सव का समापन, तालियों से गूंजा सभागार

शहर के मल्टी आर्ट कल्चरल सेंटर में विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर चल रहे चार दिवसीय राष्टीय नाट्य उत्सव भव्य समापन हुआ, जिसमें मणिपुर के कलाकारों द्वारा धर्मबीर भारती की रचना अंधा युग का बखूबी मंचन किया। आंगिक अभिनय की प्रधानता वाले नाटक में कलाकारों का अभिनय, नाटक निर्देशन, संगीत तथा प्रकाश सभागार में तालियां बटौरने में कामयाब रहा। पिछले चार दिन से चल रहे उत्सव के समापन पर जाॅय मैसनम के निर्देशन में तैयार नाटक अंधा युग के दौरान हरियाणा कला परिषद् के उपाध्यक्ष संजय भसीन बतौर मुख्यअतिथि उपस्थित रहे। वहीं विशिष्ट अतिथियों के रुप में रंगकर्मी व हरियाणा कला परिषद् के सदस्य लोकेश मोहन खट्टर, रवि मोहन रास, संजीव लखनपाल तथा मनीष जोशी उपस्थित रहे। मंच का संचालन विकास शर्मा द्वारा किया गया। जॉय मैसनम द्वारा निर्देशित नाटक अंधा युग निर्देशक के भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक दुविधाओं से जूझ रहे पात्रों की मानवीय भावनाओं की व्यापक सरगम को प्रकट करता है। महाभारत के अठारह दिवसीय युद्ध के अंतिम दिन को प्रकट करने वले नाटक में अश्वत्थामा और गांधारी को प्रमुखता दी गई। जहां एक ओर अश्वत्थामा अपने पिता की मृत्यू का बदला लेने के पाण्डवों पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करता है, वहीं गांधारी अपने पुत्रशोक में कृष्ण को श्राप तक दे देती है। नाटक में अश्वत्थामा है जो अपने पिता द्रोणाचार्य की मृत्यु और दुर्योधन की मौत का बदला लेने के लिए पांडवों के खिलाफ घातक एक आदमी युद्ध का सामना करते हैं क्योंकि दोनों कृष्ण के कहने पर धर्म का सहारा लेकर मारे गए थे। हालाँकि, निकट आनंद की ओर व्यास, गांधारी और कृष्ण द्वारा दिए गए अधिकांश संवादों को बरकरार रखा गया।

यह नाटक एक खाली जगह पर घटित हुई लड़ाई के साथ भयंकर रूप से घटता है। नाटक में काल्पनिक रूप से डिजाइन की गई वेशभूषा पौराणिक लोकाचार की भावना को प्रकट करती है। अश्वत्थामा कृष्ण को चुनौती देते हुए, ब्रह्मांड को नष्ट करने के लिए नरसंहार में लिप्त, अपने चरित्र का बदला लेने की गहरी भावना से निवेश करता है। वहीं गांधारी निर्दोष वाक्पटुता और भीतर की पीड़ा अपने सौ पुत्रों की मृत्यू के कारण कृष्ण को श्राप देती है। तब कृष्ण गांधारी को समझाते हैं कि युद्ध में न तो किसी की जीत हुई है और न ही किसी की हार। प्रत्येक व्यक्ति में स्वयं कृष्ण को ही आघात मिला है। नाटक में संवाद कम और अभिनय ज्यादा देखने को मिला। कलाकारों की कड़ी मेहनत उनके अभिनय में साफ झलक रही थी। नाटक के सभी पात्र अपनी भूमिका के साथ न्याय कर रहे थे। नाटक के मंचन दौरान आलम ऐसा था कि नाटक का संगीत, कलाकारों के संवाद और दर्शकों की तालियों के अलावा सभागार में और कुछ सुनाई ही नहीं दिया। जहां कलाकारों ने पूरी गम्भीरता के साथ नाटक मंचन किया वहीं दर्शकों ने भी पूरी एकाग्रता के साथ मंचन देखा। नाटक के अंत में लगभग दस मिनट तक दर्शक अपने स्थान पर खड़े होकर तालियां बजाते नजर आए। नाटक में गांधारी के सशक्त अभिनय में साजिदा साजी ने भरपूर वाहवाही लूटी। कार्यक्रम के दौरान उपाध्यक्ष संजय भसीन और निदेशक नागेंद्र शर्मा ने रंगकर्मी लोकेश मोहन खट्टर, मनीष जोशी, संजीव लखनपाल तथा रवि मोहन सहित नाटक निर्देशक जाॅय मैसनम को स्मृति चिन्ह भेंटकर आभार जताया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में दर्शक उपस्थित रहे।

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