मकर संक्रांति को महापर्व की भी संज्ञा दी गई है। इस दिन अगर आप दान,ध्यान,स्नान आदि करते हैं तो उसका फल पूरे साल मिलता है। सूर्य के राशि परिवर्तन को संक्रांति कहते हैं। यह बदलाव साल में एक बार आता है। सूर्य के धनु राशि से मकर राशि पर जाने का महत्व इसलिए अधिक है कि इस समय सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाता है।
मकर संक्रांति पर स्नान और दान का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन दिया गया दान इस जन्म के साथ अगले जन्म में करोड़ो़ गुना होकर मिलता है। मान्यता है कि यहां जितने भी दान किए जाते हैं वे अक्षय फल देने वाले होते हैं। महाभारत के अनुसार ‘यह देवताओं की संस्कार की हुई भूमि है। यहां दिया हुआ थोड़ा सा भी दान महान होता है।’
तिल के तेल का दीपक जलाने से संक्रमण नाश
संक्रांति का अर्थ है संक्रमण। इसलिए सूर्य के इस संक्रमण से बचने और मन की शुद्धि के लिए श्रद्धालु संगम तट पर तिल के तेल का दीपक जलाते हैं। मकर संक्रांति पर द्वादश माधव के तीर्थ प्रयाग में भगवान वेणी माधव को प्रमुख तीर्थ के रूप में माना जाता है। इसलिए वेणीमाधव भगवान को दीप दान विशेष रूप से करते हैं।
विशेष दान करने का महत्वपूर्ण योग है ।
मकर संक्रांति पर हवन, अभिषेक, यज्ञ, नदियों में स्नान दान का बहुत महत्व है। इस अवसर पर खिचड़ी, तिल, गुड़, चावल, नीबू, मूली, उड़द दाल और द्रव्य का दान करना चाहिए। इस दिन सूर्य को आराध्य मानकर पितरों को भी तिल, वस्त्र आदि का दान करना पुण्यकारी होता है।
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