पिहोवा 8 फरवरी लकड़ी के छोटे से छोटे टुकड़े को भी बेहतरीन सुंदर रूप प्रदान कर लोगों के लिए उपयोगी बनाया जा सकता है, यदि इस अनूठी कला के दर्शन करने हों तो आपको अंतर्राष्ट्रीय सरस्वती महोत्सव-2019 के तहत आयोजित शिल्प मेले का भ्रमण करना होगा। यहां उत्तरप्रदेश के सहारनपुर जिले से आये अरशद व्यर्थ समझी जाने वाली लकडिय़ों को आकर्षक रूप में प्रदर्शित कर रहे हैं।
अरशद बताते हैं कि व्यर्थ पड़ी लकडिय़ों को तराशने का प्रयास किया तो एक से बढकऱ एक सुंदर आकृतियां बनने लगी। बस फिर वे पीछे नहीं हटे। उन्होंने बेकार समझ कर फेंकी जाने वाली लकडिय़ों के टुकड़े, फट्टियों, डंडियों, पेड़ की गांठ-जड़ आदि को एकत्रित करना शुरु कर दिया। इसके बाद अपनी कल्पनाशक्ति तथा प्रतिभा के बल पर उन्होंने व्यर्थ की लकडिय़ों को उपयोगी वस्तुओं में परिवर्तित करना प्रारंभ कर दिया। अंतर्राष्ट्रीय सरस्वती महोत्सव के शिल्प मेले में आरिफ ने अपनी इस कला को प्रदर्शित किया है। छोटी से छोटी लकड़ी के टुकडों को उन्होंने चाबी के छल्लों, अंग्रेजी के अक्षर, रसोई के सामान तथा महिलाओं-युवतियों की श्रंगार वस्तुओं का रूप दिया है। इनकी यहां अच्छी मांग है। लकड़ी के थोड़े बड़े टुकड़ों से वे रसोईघर के अन्य सामानों का रूप दे रहे हैं। कुछ और बड़ी लकडिय़ां मिलती हैं तो उसकी सहायता से दिवार घड़ी तथा मूढ़े एवं बैठने की वस्तुएं बना रहे हैं। लकड़ी की फट्टियों से वे कुर्सियां भी बना रहे हैं।
इसके अलावा वे लकड़ी का फर्नीचर बनाने में महारत रखते हैं। यहां उन्होंने 20 हजार रुपये से लेकर 1 लाख 20 हजा रुपये की कीमत तक के सोफे भी प्रदर्शित किये हुए हैं। इसके अलावा डायनिंग टेबल, झूले, बैड, झूला कुर्सियों का अच्छा खजाना देखा जा सकता है। वे कहते हैं कि उन्हें अपनी शिल्पकला का प्रदर्शन करने के लिए कुरुक्षेत्र गीता महोत्सव व सरस्वती महोत्सव का बेसब्री से इंतजार रहता है। अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्स्व व सरस्वती महोत्सव जैसे मेले शिल्पकारों के लिए एक संजीवनी है।
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