कुरुक्षेत्र, 2 जून: उत्तर भारत के प्रमुख त्यौहारों करवा चौथ की तर्ज पर 3 जून सोमवार को वट सावित्री अमावस्या, सोमावती अमावस्या और शनि जयंती एक साथ मनाई जाएगी। यह एक दुर्लभ योग है जिसका विशेष महत्व माना जाता है। वैद्य पंडित प्रमोद कौशिक ने उपरोक्त जानकारी देते हुए बताया कि इस दिन कुरुक्षेत्र के तीर्थों में स्नान व दान का विशेष महत्व माना जाता है और वट वृक्ष (बड़ का पेड़) की पूजा का भी महत्व माना जाता है और वट वृक्ष (बड़ का पेड़) साथ ही सोमवार को शनि जयंती होने के कारण पीपल की पूजा का भी महत्व माना जाता है। इस दिन सावित्री ने यमदूत से अपने पति सत्यवान के प्राण वापिस ले लिए थे।
गीता की जन्मस्थली कुरुक्षेत्र में वट सावित्री अमावस्या को लेकर श्रद्धालुओं में बेहद उत्साह रहता है। सोमवार को वट सावित्री अमावस्या देव पितृ कार्य अमावस्या, सोमवती अमावस्या, पीपल पूजन, शनि जयंती का विशेष दुर्लभ योग बन रहा है। वट सावित्री अमावस्या को विवाहित स्त्रियां उपवास रखती हैं और बड़ के पेड़ की पूजा कर अपने पति की दीर्घायु की कामना करती हैं। अमावस्या के दिन भोलेनाथ का गाय के दूध के साथ रुद्राभिषेक करवाना, गायों को अपने वजन के बराबर हरी घास खिलाना, जल पिलाना व दान करने का विशेष महत्व माना जाता है। सावित्री अमावस्या के दिन लक्ष्मी नारायण के मंदिर में पूजा अर्चना की जाती है। वट सावित्री व्रत कथा में आता है कि सत्यवान के सिर में चक्कर आने लगा, तब सावित्री ने उसे वट वृक्ष के नीचे सुला दिया क्योंकि वट वृक्ष के तनों से लटकी जड़ें या डालें शरीर के दोषों को दूर करती हैं। उन्होंने बताया कि शनि जयंती के पावन पर्व पर पीपल के वृक्ष को स्पर्श करने मात्र से पापों का क्षय हो जाता है और परिक्रमा करने से आयु बढती है। व्यक्ति मानसिक तनाव से मुक्त हो जाता है। कुरुक्षेत्र की पावन धरती पर श्रीमद्भगवद् गीता में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने अपने मुख से कहा कि वृक्षों में मैं पीपल हूं। उन्होंने शनि जयंती के पर्व पर बताया कि व्यक्ति की जन्म कुंडली में और गोचर में शनि के प्रभावों को देखते हुए शनि को भाग्य विधाता के नाम से भी जाना जाता है।
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