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सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक से हुआ चतुरंग नाट्य उत्सव का आगाज

भारतीय संस्कृति में स्त्री की महानता का वर्णन निरंतर होता रहा है। स्त्री के नारीत्व की सार्थकता नारी के मातृत्व में नहीं होती। नारी अलग अलग पक्ष में अपना अलग रुप रखती है। हर काल में नारी ने स्वयं को पुरुषों की अपेक्षा अधिक बलशाली सिद्ध किया है। ये कहना था वरिष्ठ लेखक रतन चंद सरदाना का। वे मैक में शुरु हुए चार दिवसीय चतुरंग नाट्य समारोह के अवसर पर दर्शकों को सम्बोंधित कर रहे थे। मौका था उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज व हरियाणा कला परिषद् मल्टी आर्ट कल्चरल सेंटर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित नाट्य उत्सव का। उत्सव के उद्घाटन अवसर पर ग्रामीण शिक्षा विकास समिति के संरक्षक रतन चंद सरदाना मुख्यअतिथि के रुप में उपस्थित रहे। वहीं विशिष्ट अतिथि उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज के निदेशक इंद्रजीत सिंह ग्रोवर उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता हरियाणा कला परिषद् के उपाध्यक्ष संजय भसीन ने की। मंच संचालन विकास शर्मा द्वारा किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों ने दीप प्रज्जवलित कर की। कार्यक्रम से पूर्व मैक के क्षेत्रीय निदेशक नागेंद्र शर्मा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार की नाट्य प्रोत्साहन योजना के तहत आयोजित उत्सव में विभिन्न राज्यों के नाटकों का मंचन किया जाना है, जिससे रंगमंच के क्षेत्र को बढ़ावा मिलगा। सुरेंद्र वर्मा द्वारा लिखित नाटक सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक का निर्देशन विश्वास चैहान ने किया। परिंद्र विंग्स आफ इमेजिनेशन, चरखी दादरी के कलाकारों द्वारा अभिनीत नाटक में नारी की महता का बखान किया गया। पुरातन काल की कहानी को दिखाते हुए नाटक ने पुरुष प्रधान समाज पर कटाक्ष किया। धर्मशास्त्रों की वर्जनाएं आज के दौर में प्रासांगिक नहीं हैं। उस दौर में भी राजसी घरानों के भीतर चलते षड़यंत्रों की वजह से कई घृणित कर्मकांड होते रहे हैं।

ऐसे ही पुरातन समय की एक प्रथा रही है नियोग। जिसमें निसंतान महिला गर्भधारण करने के लिए पर पुरुष को अपना उप पति मान कर उससे संसर्ग कर संतान उत्पन्न करती रही है। मल्ल राज्य के राजा ओक्काक के वंश की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए राज्य की मंत्री परिषद तय करती है कि राजवंश के वारीस के लिए रानी शीलवती को नियोग विधि से संतान प्राप्ति के लिए अपनी मर्जी से किसी पुरुष को अपना उप पति चुन कर सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक उसके साथ रहना होगा। इसका ढिंढोरा पूरे राज्य में पीट दिया जाता है। राज महल में भी इस बात को लेकर बेचैनी का आलम है, राजा ओक्काक और रानी शीलवती इस प्रथा से आहत हैं। मगर मंत्री परिषद के इस फैसले को मानने को बाध्य भी हैं। मंत्री परिषद के इस षड़यंत्रकारी बहकावे में आकर रानी अपनी मर्जी से आर्य प्रतोष को अपना उप पति चुनती है। जिससे वह पहले भी प्रेम करती थी, मगर विवाह इसलिए नहीं कर पाई थी कि वह गरीब युवक था। अपने उप पति के साथ रात बिताने के बाद रानी शीलवती का रंगढंग ही बदल जाता है। वह जीवन में पहली बार प्रणय की खुशबू से सराबोर हो जाती है। अब वह राज महल में पहुंच कर राजा और मंत्री परिषद के सदस्यों से व्यंग्यात्मक लहजे में बात करती है। रानी बताती है कि पुरुषों में कमी के कारण त्याग नारी को ही करना पड़े। त्याग के बाद भी यदि नारी को संतान नहीं होती, तो नारी की इज्जत तो चली जाती है। नाटक में खंडित होती मर्यादाओं, धर्म शास्त्रों के नाम पर होने वाले पाखंड का पर्दाफाश किया गया है।

नाटक में राजा ओक्काक के प्रभावशाली किरदार को विश्वास चैहान ने निभाया। वहीं पर रानी शीलवती के रूप में अंजवी सिंह हुड्डा ने लाजवाब अभिनय किया। अन्य भूमिकाओं में अविनाश चैहान, परवेज आलम, मंयक, विशाल सैनी, रिशब पारीक, रिंकू, मंयक शर्मा, श्रद्धा सैनी, मोहित गिरधर व योगेश रहे। प्रकाश व्यवस्था मनीष डोगरा ने सम्भाली। नाटक के बाद इंद्रजीत सिंह ग्रोवर ने कहा कि मैक परिसर में भविष्य में भी उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र द्वारा सांस्कृतिक आयोजन किये जाते रहेंगे। आगामी दिनों में अतुल्य भारत कार्यक्रम मैक में आयोजित किया जाएगा, जिसमें विभिन्न प्रदेशों के लोक कलाकार पंाच दिन सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देंगे। कार्यक्रम उपरांत सभी कलाकारों को एनसीजेडसीसी की ओर से सम्मानित किया गया। वहीं मैक की ओर से नागेंद्र शर्मा ने अतिथियों तथा नाटक निर्देशक को स्मृति चिन्ह भेंट किये। इस मौके पर एनसीजेडसीसी के कार्यक्रम संयोजक अजय गुप्ता, देवराज सिरोहीवाल, बृज शर्मा आदि भी उपस्थित रहे।

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