कुरुक्षेत्र, 10 जनवरी। प्राचीन शिव साईं मंदिर में लोहड़ी एवं मकर संक्रांति के उपलक्ष्य में करवाई जा रही श्रीमद्भागवत कथा में कथावाचक पं.राम अवतार श्रोत्रिय ने धु्रव चरित्र सुनाया। प्रसंग में राम अवतार ने बताया कि सतयुग के दौरान अवधपुरी में राजा उत्तानपद राज किया करते थे। उनकी बड़ी रानी का नाम सुनीति था और उनके कोई संतान नहीं थी। देवर्षि नारद रानी को बताते हैं कि यदि तुम दूसरी शादी करवाओगी तो संतान प्राप्त होगी। रानी अपनी छोटी बहन सुरुचि की शादी राजा से करवा देती है और समय आने पर उससे एक संतान की उत्पत्ति होती है। उसी समय कुछ दिनों के बाद बड़ी रानी भी एक बालक को जन्म देती है। 5 वर्ष बाद जब राजा अपने बेटे का जन्म दिन मना रहे थे तो बालक धु्रव भी बच्चों संग खेलता हुआ उनकी गोद में बैठ गया, जिस पर बड़ी रानी उसको लात मारकर उठा देती है और उसे कहती है कि यदि अपने पिता की गोद में बैठना है तो अगले जन्म तक इंतजार कर। बालक धु्रव यह बात चुभ जाती है और वह वन में जाकर कठिन तपस्या करने लगते हैं। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु उन्हें दर्शन देते हैं और उन्हें मनचाहा वरदान देने का वचन देते हैं।
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