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कार्यशाला में गांधी जी का शिक्षा दर्शन, स्वास्थ्य के लिए योग, ऐतिहासिक स्मारकों और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में पुरातत्व और संग्रहालय की भूमिका पर शिक्षकों को दिए व्याख्यान

कुरुक्षेत्र, 13 दिसम्बर। विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान एवं सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केन्द्र (सी.सी.आर.टी.) नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यशाला के तीसरे दिन विषय विशेषज्ञों द्वारा गांधी जी का शिक्षा दर्शन, स्वास्थ्य के लिए योग, ऐतिहासिक स्मारकों और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में पुरातत्व और संग्रहालय की भूमिका पर शिक्षकों को व्याख्यान दिए। सी.सी.आर.टी. की एग्जीक्यूटिव कमेटी के सदस्य एवं विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के निदेशक डॉ. रामेन्द्र सिंह ने कार्यशाला में आए विषय विशेषज्ञों शिक्षाविद् डॉ. हिम्मत सिंह सिन्हा का परिचय कराया। उन्होंने गांधी दर्शन को छात्रों के जीवन में उतारने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि आज हमें बच्चों के अंदर स्वदेशी की भावना और उनका चरित्र निर्माण करने पर तथा स्वदेशी भावना जागृत करने की नितान्त आवश्यकता है। विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के शोध निदेशक डॉ. हिम्मत सिंह सिन्हा ने कहा कि गांधी जी ने देश के नवनिर्माण के लिए प्रत्येक क्षेत्र में अपना योगदान दिया है। चाहे वह राजनीति का क्षेत्र हो, चाहे नैतिकता और धर्म तथा अर्थशास्त्र का क्षेत्र हो। गांधी जी शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन और समाज में ऊंचे आदर्श स्थापित करने का सबसे सशक्त माध्यम मानते थे। उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा की कटु आलोचना की कि इसने हमारे देश को अपनी संस्कृति और अपने धरातल से बिल्कुल काट दिया है। इस शिक्षा में मातृभाषा की उपेक्षा की गई है, जिसके कारण बच्चों को देश की परम्पराओं का पता ही नहीं लग पाता। इस शिक्षा में श्रम का अभाव है इसलिए पढ़ा-लिखा नौजवान अपने हाथ से कोई कार्य नहीं कर सकता और स्वावलम्बी नहीं बन सकता। गांधी जी की शिक्षा का सारा प्रारूप उनकी बेसिक शिक्षा में निर्धारित कर दिया गया है, जिसको उन्होंने बुनियादी तालीम का नाम दिया। इस शिक्षा में जो मौलिक सिद्धांत हैं, उसमें गांधी जी के अनुसार सातवीं तक की शिक्षा अनिवार्य और निःशुल्क होनी चाहिए। उसके साथ-साथ बच्चे को कोई न कोई क्राफ्ट या हस्तकौशल का ज्ञान अवश्य कराना चाहिए। यह शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए और छात्र में स्वदेश प्रेम जागृत करके उसका चरित्र निर्माण करने का प्रावधान आवश्यक है।

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