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स्वामी श्रद्धानन्द ने विलुप्त हुई प्राचीन गुरुकुलीय पद्धति को पुनः स्थापित किया

कुरुक्षेत्र, 29 दिसम्बर। स्वामी श्रद्धानन्द ने अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को नकारते हुए विलुप्त हो चुकी हमारी प्राचीन गुरुकुलीय पद्धति को पुनः स्थापित किया। उन्होंने गुरुकुल कांगड़ी, गुरुकुल इन्द्रप्रस्थ, गुरुकुल कुरुक्षेत्र, गुरुकुल सूपा (गुजरात) सहित सर्वप्रथम जालंधर आर्य पुत्री पाठशाला खोलकर देश में समाज में शिक्षा के प्रसार में महती भूमिका निभाई। उक्त शब्द आज स्वामी श्रद्धानन्द जी के 93वें बलिदान दिवस समारोह को बतौर मुख्य अतिथि सम्बोधित करते हुए गुजरात के राज्यपाल एवं गुरुकुल के संरक्षक आचार्य देवव्रत ने कहे। समारोह की अध्यक्षता हरियाणा के बिजली, ऊर्जा एवं जेल विभाग मंत्री चौ. रणजीत सिंह चौटाला ने की। आचार्य देवव्रत ने कहा कि गुरुकुलों की स्थापना के साथ देश को आजाद कराने में भी महती भूमिका अदा की। स्वामी श्रद्धानन्द पूरे विश्व में एकमात्र ऐसे व्यक्ति है जिन्होंने गैर मुस्लिम होते हुए दिल्ली की जामा मस्जिद के मिम्बर से पवित्र वेदमंत्रों का उच्चारण किया। महात्मा गांधी को ‘महात्मा’ की उपाधि देने वाले भी स्वामी श्रद्धानन्द ही थे। उन्होंने कहा कि मानव जन्म से नहीं बल्कि सुकर्मों से महान बनता है, स्वामी श्रद्धानन्द इसके प्रत्यक्ष प्रमाण है। समारोह को सम्बोधित करते हुए मंत्री रणजीत सिंह चौटाला ने कहा कि स्वामी श्रद्धानन्द ने स्वराज्य प्राप्त करने, देश को अंग्रेजों की दासता से मुक्त करने, दलितोद्धार व पश्चिमी शिक्षा की जगह वैदिक शिक्षा प्रणाली लागू कर महान कार्य किए। हमें उनके व्यक्तित्व व कृतित्व से प्रेरणा लेनी चाहिए यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धाजंलि होगी। उन्होंने अपने स्वैच्छिक कोष से गुरुकुल कुरुक्षेत्र को 11 लाख रूपये देने की घोशणा भी की। समारोह के उपरान्त प्रेसवार्ता को सम्बोधित करते हुए मंत्री ने हरियाणा की जेलों की कृषि योग्य भूमि पर आचार्य देवव्रत जी की प्रेरणा से कम लागत प्राकृतिक कृषि करने की बात कही।

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