कुरुक्षेत्र, 15 दिसम्बर। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरुक्षेत्र में चल रही अंतर्राष्ट्रीय गीता संगोष्ठी में तीसरा दिन भारतीय प्रबंधन एवं श्रीमद्भगवद गीता के दर्शन पर केन्द्रित रहा। विश्वविद्यालय के स्कूल आफ मैनेजमेंट की ओर से आयोजित इस विशेष सत्र में विद्वानों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए व आधुनिक भारत के निर्माण में प्रबंधन की दृष्टि से श्रीमद्भगवद गीता पर मंथन किया। सत्र में भारत के साथ-साथ विदेशों से संसाधन व्यक्तियों और प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया था।
गुरुग्राम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर मारकंडे आहुजा ने बताया कि प्रबंधन सूचना और ज्ञान प्रदान करता है लेकिन गीता अंतर्दृष्टि प्रदान करता है जो सबसे महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि प्रबंधन की दृष्टि से यह एक उपयोगी ग्रंथ है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन प्रबंधन के लिए श्रीमद्भगवद गीता को आचरण में लाना चाहिए।
इस सत्र में शिकागो अमेरिका से आई वंदना झिंगन ने कहा कि श्रीमद्भगवद गीता समय की सीमाओं के बावजूद दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति के लिए उपयोगी है। 5000 वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र की कर्मभूमि में जिस दिव्य वाणी का संदेश दिया गया वह प्रबंधन की दृष्टि से बहुत ही उपयोगी व आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि जीवन में जिस तरह की चुनौतियां बढ़ रही हैं ऐसे में समय के साथ इसकी उपयोगिता भी बढ़ रही है।
किर्गीस्तान से आई शोधकर्ता मखाए लियो नजरोवा ने मनस और गीता की अनुवाद की समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारतीय ग्रंथ श्रीमद्भगवद गीता और किर्गीस्तान में मनस दोनों का मूल आधार एक समान ही है। धर्म, कर्म, न्याय एवं त्याग से ही मानव समाज का कल्याण संभव है। उन्होंने भारतीय छात्रों से आग्रह करते हुए कहा कि वह मनस का अध्ययन करें व इसके विभिन्न पहलुओं के बारे में ज्ञान अर्जित करें।
सेंट्रल यूनिवर्सिटी महेन्द्रगढ से आए डॉ. दिनेश चहल ने कहा कि श्रीमद्भगवद गीता दुनिया का पहला ऐसा ग्रंथ है जिसकी जयंती मनाई जाती है। उन्होंने कहा कि यदि धर्म घाट है तो गीता गंगा है।
जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कृष्ण के पांडे ने कहा कि गीता से ज्ञान अमर है। उन्होंने कहा कि गीता लेखन का एकमात्र टुकड़ा है जो किसी भी व्यापार को टिकाऊ बना सकता है। गीता में हर व्यवसाय की समस्या का समाधान होता है। पं. सतीश शर्मा ने कहा कि गीता विश्व का सबसे बड़ा समय प्रबंधन ग्रंथ है जो कहता है कि कर्म वह जो समाज के हित में हो। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भगवद गीता कर्म की सबसे बड़ी प्रतिष्ठा है जो व्यक्ति को कर्म के आधार पर वर्गीकृत करती है। श्रीमद्भगवद गीता सभी दर्शनशास्त्रों का पूर्ण रूप है जिसे समस्त संसार ने स्वीकार किया है। उद्घाटन सत्र के बाद तकनीकी सत्र में भारत और विदेशों से प्रतिनिधिमंडल ने अपने पत्र प्रस्तुत किए।
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