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शिल्प और लोक कला के संगम से कुरुक्षेत्र को मिली विश्व में पहचान

कुरुक्षेत्र 22 दिसम्बरअंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव 2018 में आने वाले पर्यटकों ने इस महोत्सव को विश्वस्तरीय पहचान देने का काम किया है। इस महोत्सव की जहां भारत ही नहीं विश्व के विभिन्न देशों में जोरदार प्रशंसा की जा रही है, वहीं इस ऐतिहासिक महोत्सव के शिल्प और सरस मेले में देश के कोने कोने से आए शिल्पकार तथा 17 राज्यों से आए लोक कलाकार भी गदगद नजर आए। अहम पहलू ये है कि अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव के दौरान ब्रहम सरोवर का हर घाट शिल्पकला व लोक कलाकारों की संस्कृति के संगम से सरोबार हो गया। यहां इस बात का उल्लेख करना भी जरूरी है कि कुरूक्षेत्र विकास बोर्ड, जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन के पुख्ता इंतजामों के बीच लाखों पर्यटकों को हर प्रकार की सहुलियत दी गई है।
केडीबी के मानद सचिव मदन मोहन छाबड़ा ने बताया कि अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव में देश के कोने-कोने से 7 दिसम्बर से 21 दिसम्बर तक करीब 25 लाख से ज्यादा पर्यटक शिल्प, सरस और सांस्कृतिक लोक कला के दर्शन कर चुके हैं। अहम पहलु यह है कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल के प्रयासों से ही अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव में पर्यटकों की भीड़ का ऐतिहासिक आंकडा बना है। उन्होंने कहा कि यह महोत्सव देश के पर्यटकों की पसंद बन चुका है और यहां के लोगों को भी आर्थिक रूप से पर्यटकों के आने का फायदा मिल रहा है। राज्य सरकार की तरफ से अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव में पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए मुख्य कार्यक्रमों के लिए नंदा सदाचार स्थल के पास मेला क्षेत्र में मुख्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया है, वहीं ब्रह्मसरोवर के पानी के बीचोबींच ‘गीता ऑन सरोवर’ थीम पर आधारित ध्वनि एवं प्रकाश शो का आयोजन किया गया। इसके अलावा गुजरात पैवेलियन और हरियाणा पैवेलियन को स्थापित करने के साथ-साथ विभागीय योजनाओं की राज्यस्तरीय प्रदर्शनी, सरस्वती प्रदर्शनी का आयोजन किया गया।
उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय गीता जयंती महोत्सव के 16वें दिन शनिवार को भी सुबह से लेकर सांय तक पर्यटकों व श्रद्धालुओं के आने का तांता लगा रहा। इस महोत्सव में 21 दिसम्बर तक करीब 20 लाख पर्यटक महोत्सव के सरस, शिल्प मेले और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अवलोकन कर चुके है। इन पर्यटकों ने जहां जमकर खरीददारी की, वहीं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी खूब लुत्फ उठाया। इतना ही नहीं पर्यटकों ने राजस्थानी व्यंजनों, अमृतसरी कुल्छे और गुड़ के हलवे के साथ ताऊ बलजीत की जलेबी का भी स्वाद चखा। इन कार्यक्रमों से प्रभावित होकर देश-विदेश से पर्यटक शिल्प कला, सांस्कृतिक कला को देखने के लिए महोत्सव में पंहुच रहे हैं। महोत्सव के दौरान 22 व 23 दिसम्बर को छुट्टïी होने के कारण पर्यटकों की संख्या में और इजाफा होगा। प्रतिदिन आने वाले पर्यटकों की गणना माने तो इन दोनों दिनों में 5 लाख से ज्यादा पर्यटकों के आने का अदंाजा है, जिससे इस बार महोत्सव में पर्यटकों की संख्या एक नया रिकार्ड कायम करेगी। कुरूक्षेत्र विकास बोर्ड के सीईओ संयम गर्ग ने कहा कि प्रशासन और तमाम संस्थाओं के सहयोग से इस समारोह को सफल बनाया गया है। इस बार किसी भी श्रद्धालु व पर्यटक को किसी प्रकार की परेशानी नहीं आने दी गई।
सोशल मीडिया पर भी करीब 56 लाख लोग कर चुके है शिरकत
मेले में पहुंच रही पर्यटकों की भीड़ जहां नए आयाम स्थापित कर रही है वहीं सोशल मीडिया पर भी करीब 56 लाख लोग इस महोत्सव के ऐतिहासिक क्षणों को का आनंद ले चुके है। शुक्रवार तक महोत्सव की वेबसाईट पर करीब 38 लाख लोगों ने क्लीक किया है। इतना ही नहीं फेसबुक, टवीटर, इंस्टाग्राम, फ्लीकर, एट दिस जैसी वेसाईट पर भी करीब 18 लाख लोगों ने शिरकत की है।
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हाथ से बनी दरियों ने जीता पर्यटकों का दिल
महोत्सव में सभी दरियों व गलीचाों के स्टालों पर अच्छी खासी भीड़ रही। दरियों की स्टाल के मालिक का कहना है कि दरियों बनाना और बेचना उनका पारंपरिक व्यवसाय है। वे पिछले कई वर्षो से यहां अपनी स्टाल लगाते आ रहे है। उनकी स्टाल पर कालीन, दरियां, छोटे गलीचे आदि का सामान उपलब्ध है जिनकी कीमत 150 रुपए से लेकर 10 हजार तक रखी गई हैे। उनका कहना है कि जब से उन्होंने होश संभाला है तब से वह यही दरियों को बनते और बनाते देखते आ रहे है उनका सारा परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इसी व्यवसाय में लगा हुआ है।
महोत्सव में बनारसी साडिय़ों की है धूम
महोत्सव में ब्रह्मसरोवर पर विभिन्न प्रकार की स्टाल में से बनारस की साडिय़ों की विशेष धूम रही। ये साडिय़ां और ड्रैस मटीरियल महिलाओं के आकर्षण का केन्द्र बनी। बनारसी साडिय़ों को बनाने वाले शिल्पकारों ने बताया कि वे अपने हाथों से बनाई हुई बनारसी साडिय़ों की स्टाल लगाते आ रहे है। उन्होंने बताया कि इस स्टाल पर 1500 रुपए से लेकर 10 हजार तक की साडिय़ा और सूट 150 रुपए से लेकर 1500 रुपए प्रति मीटर के हिसाब से बेच रहे है। बनारस में उनका यह पारम्परिक पेशा है, पूरा परिवार इसी कार्य में निपुण है। एक अन्य शिल्पकार ने बताया कि वे अपनी ड्रैस मटीरियल एवं साडिय़ों में सोन-चांदी का भी वर्क करते है, उसी हिसाब से उनकी कीमत निर्धारित की जाती है। पर्यटकों का काफी अच्छा रुझान देखने को मिला है।
विभिन्न राज्यों के लोक नृत्य के दिवाने हुए पर्यटक
अंतर्राष्ट्रीय गीता जयंती महोत्सव के पावन पर्व पर ब्रहमसरोवर का तट विभिन्न राज्यों की संस्कृति को अपने आगोश में समेट रहा है। इस तट पर विभिन्न राज्यों की संस्कृति पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है। शिल्प मेले के 16वें दिन चारों तरफ शिल्पकला की छोटी-छोटी दुकानों पर पर्यटक खरीददारी कर रहे थे तथा यह दुकाने भारतीय शिल्पकला के सौंदर्य को भी चरितार्थ कर रही है। जहां राजस्थान की कठपुतलियां, कच्ची घोड़ी, पंजाब का गिद्दा अपने-अपने प्रदेश के लोक नृत्य से लोगों का मनोरंजन कर रहा है वहीं बनारस की साडिय़ा, आसाम की बांस से बनी टोकरियां भी आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है। कुरुक्षेत्र निवासी इशिता और अवनी का कहना है कि दीपावली से ज्यादा इस महोत्सव का इंतजार रहता है।

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