कुरुक्षेत्र 17 दिसम्बर आज का मानव अवसाद ग्रस्त है, आज का मानव आत्मविस्मृत है। आज का मानव भौतिकवासना से ग्रसित है। यही सबसे बड़ा संकट है लेकिन गीता हमें आत्मबोध कराती है। जीवन प्रबंधन के समस्त आयाम गीता में निहित हैं। यह उद्गार जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने मातृभूमि सेवा मिशन द्वारा अंतर्राष्ट्रीय श्रीमद्भगवद्गीता जयंती समारोह के उपलक्ष्य में फतुहपुर में श्रीमद्भगवद गीता में जीवन प्रबंधन विषय पर आयोजित व्याख्यान में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि गीता देव वाणी है। देवता हमारे भीतर अपनी शक्ति का निवेश करना चाहते हैं, लेकिन हमें चारित्रिक और नैतिक बल से उसका पात्र बनना होगा। हमें धन की अपेक्षा ज्ञान और संयम का निवेश करना चाहिए। मनुष्य अपने भीतर सकारात्मक सोच, विजयभाव और उदारता को बनाए रखे। उन्होंने कहा कि जीवन सकारात्मक होना चाहिए हमारे पास कुछ और नहीं है, तो कम से कम हम मुस्कान का दान तो कर ही सकते हैं। यदि हम किसी को खुशी प्रदान कर सकते हैं, तो यह एक सुखद पहल है।
गीता कहती है कि व्यक्ति अपने आप से प्रश्र एवं संवाद करे कि मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ? मनुष्य के भीतर अवसाद अज्ञान के कारण है । इससे पूर्व मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ० श्रीप्रकाश मिश्र ने अठारह दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय श्रीमद्भगवद गीता जयंती समारोह का प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा कि गीता के महान सार को जीवन में धारण करने के उद्ेश्य से विविध कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है।
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