कुरुक्षेत्र 2 जनवरी। मातृभूमि सेवा मिशन ,कुरुक्षेत्र की ग्वालियर, मध्य प्रदेश शाखा द्वारा एक व्यख्यान स्वामी विवेकानंद के जीवन पर श्रीमद्भगवद्गीता का प्रभाव विषय पर ग्वालियर के अति प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान मिस हिल हायर सेकेंडरी स्कूल के सभागार में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती एवं स्वामी विवेकानंद के चित्र पर माल्यार्पण और पुष्पार्चन से हुआ। विद्यालय प्रबंधन समिति के पदाधिकारियों द्वारा सामूहिक रूप से कार्यक्रम के मुख्यवक्ता और मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ श्रीप्रकाश मिश्र का स्वागत किया। मुख्य वक्ता डॉ श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा स्वामी विवेकानंद के जीवन पर श्रीमद्भगवद गीता का बहुत प्रभाव था। उनके आध्यात्मिक चिंतन का आधार गीता था। स्वामी जी अद्वैत वेदांत के अनुनायी थे। उनके द्वारा प्रतिपादित राज योग, ज्ञान योग, भक्ति योग एवं कर्म योग गीता के ही अंग थे। स्वामी विवेकानन्द का मानना था कि यदि कोई मनुष्य नि:स्वार्थता से कार्य करे, तो क्या उसे फल प्राप्ति नहीं होती? असल में तभी तो उसे सर्वोच्च फल की प्राप्ति होती है। हमें कर्म करने का ही अधिकार है, कर्मफल में हमारा कोई अधिकार नहीं। स्वामी विवेकानन्द का जीवन श्रीमद्भगवद्गीता के निष्काम कमयोग को समर्पित था। भारतीयों में फूट डालने के लिए अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक निर्वाचन और अछूतिस्तान बनाने की चाल चली। लेकिन गाँधी जी ने उनकी चाल को कामयाब नहीं होने दिया। पूरा भारत गाँधी जी के पीछे चलने लगा। हिन्दू-मुसलमान सभी एक होकर साथ चलने लगे। एकता की यह प्रेरणा मिली श्रीमद्भगवद्गीता से। भारत को आजादी के दरवाजे तक ले आयी यह श्रीमद्भगवद्गीता। लोकमान्य तिलक ने गीता रहस्य लिखा। गाँधीजी ने भी श्रीमद्भगवद्गीता पर टीका लिखीं। विनोबा भावे, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, डॉ0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन सबने श्रीमद्भगवद्गीता पर लिखा। नेहरू जी ने भी श्रीमद्भगवद्गीता की अनुशंसा की।
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