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मकर संक्रांति पर सूर्योपासना का विशेष महत्व: कौशिक

कुरुक्षेत्र, 12  जनवरी  : भारत देश में वैसे तो बहुत से पर्वों का महत्व मिलता है। इन सब में मकर संक्रांति को भी एक महान पर्व माना जाता है। कुरुक्षेत्र यज्ञ मंदिर ट्रस्ट दुखभंजन मार्ग कुरुक्षेत्र के सचिव वैद्य पंडित प्रमोद कौशिक ने जानकारी देते हुए बताया कि मकर संक्रांति पर्व वैदिक कालीन पर्वों में से एक है। यह भारत के संपूर्ण प्रांतों में विविध नामों और रूपों में अति प्राचीन काल से मनाई जा रहा है। मकर संक्रांति एक ऋतु पर्व के रूप में भी मनाई जाती है क्योंकि इस दिन भगवान सूर्य नारायण उत्तरायण हो जाते हैं और देवताओं का ब्रह्म मुहूर्त प्रारंभ हो जाता है। अत: उत्तरायण काल को शास्त्रकारों ने साधनाओं एवं परा-अपरा विद्याओं की प्राप्ति हेतु सिद्धकाल बताया है। सूर्य उपासना के लिए इस दिन का विशेष महत्व माना जाता है। सूर्य को हिन्दू धर्म के लोग प्रधान देवता के रूप में मानते एवं पूजते हैं। सूर्य उन्नति और निरंतर आगे बढऩे की प्रेरणा देता है। ज्योतिष व मुहूर्त ग्रंथों के अनुसार मेहारम्भ, गृहप्रवेश, देव प्रतिष्ठा, सकाम यज्ञ-यज्ञादि अनुष्ठानों के लिए उत्तरायण काल को ही प्रशस्त कहा गया है। जीवन तो जीवन मृत्यु तक के लिए भी उत्तरायण काल की विशेषता शास्त्रों में बतलाई गई है।
वैद्य पंडित प्रमोद कौशिक ने मकर संक्रांति के पावन पर्व पर देशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए बताया कि इस बार मकर संक्रांति का पावन पर्व 15 जनवरी मंगलवार को मनाया जाएगा। क्योकि भारतीय पर्वो में मकर सक्रांति एक एैसा पर्व है जिसका निर्धारण सुर्य की गति के अनुसार होता है लेकिन इस वर्ष 2019 में यह पर्व 15 जनवरी मंगलवार को मनाया जाएगा हिन्दु पंचाग के अनुसार जब सुर्य एक राशी से दूसरी राशी मे प्रवेश करता है तो यह सक्रांति कहलाती है। सक्रांति का नाम करण उस राशी से होता है जिस राशी मे ंसुर्य प्रवेश करता है मकर सक्रांति के दिन सुर्य धनु राशी से मकर राशी में प्रवेश करता है। पंचाग के अनुसार इस बार सुर्य 14 जनवरी को आदि रात के बाद दो बजकर दस मिनट पर मकर राशी में प्रवेश करेगा। हिन्दू धर्म ग्रंथो के अनुसार मकर सक्रांति में पुण्य काल का विशेष महत्तव माना जाता है। इस पर्व का पुण्य काल 15 जनवरी को सुर्योदय से सूर्यास्त तक रहेगा। ज्योतिष शास्त्रानुसार मकर संक्रांति  इस दिन ग्रहपति और भगवान सूर्य देव का मकर राशि में प्रवेश होता है और शिशिर ऋतु में सूर्य उत्तरायण में भी प्रवेश करता है क्योंकि शास्त्रानुसार दो आयनों की संज्ञा दी गई है-दक्षिणायन व उत्तरायण। उत्तरायण में देवताओं का वास समझा जाता है व दक्षिणायन में असुरों का वास कहा गया है। अत: उत्तरायण को महान पुण्यदायक समय समझा जाता है। इसका प्रमाण महाभारत में भी दिया गया है कि जिसमें भीष्म पितामह ने भी शर-शैय्या पर लेटे-लेटे प्राण त्यागने हेतु सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी।

उन्होंने बताया कि इस दिन गंगासागर में स्नान करना महत्वपूर्ण फलदायक कहा गया है। कोलकाता से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर एक टापू है, जहां पर गंगा का सागर में मिलन होता है जो गंगासागर के नाम से विख्यात है। वहीं पर भगवान कपिलमुनि का प्राचीन मंदिर व तपोभूमि पर विशाल मेले का आयोजन इसी का परिचायक समझा जाता है। इस दिन स्नान करते समय प्राय: तीर्थ में नाभि तक जल में खड़े होकर सूर्य भगवान को जल देना अत्याधिक पुण्यदायक माना जाता है। मकर संक्रांति पर संन्यासी व गृहस्थियों को तीर्थ पर स्नान करना विशेष पुण्यदायी है। इस दिन चावल, दाल, खिचड़ी, गुड़, तिल, फल, जिन व्यक्तियों का कारोबार मंदी के दौर से गुजर रहा है या जो व्यक्ति मानसिक रुप से तनाव में है उनको इस दिन का लाभ उठाना चाहिए और गऊशालाओं में अपने वजन के बराबर हरि घास व गुढ दान करना चाहिए और मेवा व ऊनी वस्त्र आदि का भी दान करने का विशेष पुण्यदायक  फल माना जाता है।

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