कुरुक्षेत्र, 23 दिसंबर। श्री दुखभंजन महादेव मंदिर में सूर्य ग्रहण के उपलक्ष्य में कराई जा रही श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन कथाव्यास शुकदेव आचार्य ने भगवान श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग विस्तार से सुनाया। कथाव्यास ने बताया कि जब पृथ्वी पर दु:खों का भार बढ़ता है और धर्म की हानि होती है, तब स्वयं पृथ्वी देवी गाय का रूप धारण करके और देवताओं को साथ लेकर ब्रह्मा जी को आगे करके क्षीर सागर तट पर जाते हैं और भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं। भगवान विष्णु ब्रह्मा और पृथ्वी को आश्वस्त करते हैं कि वे धर्म व पृथ्वी की रक्षा के लिए शीघ्र अवतार लेंगे। द्वापर युग में उग्रसेन राजा मथुरा पर शासन कर रहे थे। उनका एक पुत्र कंस था जो अपनी छोटी भगिनी देवकी के विवाह की शुभ वेला में रथ पर बिठाकर विदाई कर रहा था। उसी समय आकाशवाणी हुई कि अरे मूर्ख कंस, तुम जिस देवकी को रथ पर बिठाकर विदा कर रहे हो, उसका आठवां गर्भ तुम्हारा काल होगा। यह सुनकर कंस क्रोध में आ गया और अपने म्यान से तलवार निकाल कर देवकी के बाल पकड़ कर उसका गला काटने के लिए तैयार हो गया। उस समय उसके बहनोई वसुदेव ने कंस को समझाते हुए कहा कि मैं आपको वचन देता हूं कि अपने सारे पुत्रों को आपको सौंप दूंगा। कंस ने वसुदेव और देवकी को कारागार में बंद कर दिया। इसके बाद जैसे-जैसे वसुदेव और देवकी को पुत्र पैदा होते वैसे-वैसे कंस उनका वध कर देता और इस प्रकार उसने छ:पुत्रों का वध कर दिया। सातवें पुत्र के रूप में बलराम जी आए जिसे योगमाया ने देवकी के गर्भ से निकाल कर रोहिणी के गर्भ में रख दिया। भगवान के आदेशानुसार आठवें गर्भ में स्वयं ब्रह्माण्ड नायक श्री कृष्ण मां देवकी के गर्भ में आए और उनके प्रकाश से पूरा कारागार चमक उठा। वहां से वसुदेव ने उसे ले जाकर गोकुल में नंद बाबा जी के यहां रख दिया और फिर गोकुल में बड़ी धूम-धाम से उत्सव मनाया गया।
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