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कार्यशाला में शास्त्रीय संगीत में भाव, भविष्य के लिए अतीत का संरक्षण विषयों पर दी जानकारी

कुरुक्षेत्र, 17 दिसम्बर। विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान एवं सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केन्द्र (सी.सी.आर.टी.) नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यशाला के सातवें दिन विषय विशेषज्ञ कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय संगीत विभाग से डॉ. अमरजीत कौर ने शास्त्रीय संगीत में भाव की विभिन्नताओं पर देशभर से आए शिक्षकों को महत्वपूर्ण जानकारी दी। विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के निदेशक डॉ. रामेन्द्र सिंह ने कार्यशाला में डॉ. अमरजीत कौर का परिचय कराया। उन्होंने कहा कि सी.सी.आर.टी. देशभर के विद्यालयों में सेवारत शिक्षकों/शिक्षिकाओं के लिए कार्यशालाओं का आयोजन करता है जहां नवाचार परम्पराओं से मिलते हैं। कार्यशालाओं द्वारा छात्रों एवं शिक्षकों में यह विश्वास पैदा किया जाता है कि प्रत्येक में कला क्षमता मौजूद है। उन्हें अपनी कला क्षमताओं को विकसित करने का अवसर प्रदान किया जाता है। डॉ. अमरजीत कौर ने शास्त्रीय नृत्य में भाव की विभिन्नता की जानकारी देते हुए आंगिक भाव में कत्थक एवं भरतनाट्यम में कैसे प्रदर्शन किया जाता है जिसमें सात्विक अभिनय मन के भाव को कैसे प्रदर्शित करता है, अहार्य अभिनय में वेशभूषा का उपयोग किया जाता है, रूपसज्जा का उपयोग नृत्य एवं भाव प्रदर्शन के लिए अलग-अलग किया जाता है, के बारे में प्रत्यक्ष नृत्य के माध्यम से समझाया। उन्होंने बताया कि नृत्य की भाव भंगिमाओं में रस का प्रमुख योगदान रहता है। नौ प्रकार के रस के आधार पर शारीरिक प्रदर्शन होता है। भरतनाट्यम एवं कत्थक में व्यथा या खुशी को बहुत अच्छी तरह से प्रदर्शित किया जा सकता है। उन्होंने तबलावादक अरविंद भट्ट के साथ संगत कर विभिन्न शैलियों का प्रदर्शन किया।

शिक्षण-प्रशिक्षण कार्यशाला में छत्तीसगढ़ के शिक्षक सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति देते हुए।

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